Friday, July 28, 2017 Newslinecompact.com अपना होमपेज बनाएं |
newslinecompact Logo
banner add
सोशल मीडिया
सोशल मीडियाMay 03, 2016

तीस पैतीस फीसदी मतदाता किसी पार्टी का वोट बैंक नही होता। यूपी मे भी ऐसा ही है, पर उसके लिए कोई विकल्प नही दे रहा। फिर वह बिखरा हुआ भी है,अंतिम वक्त मे भी कोई उसे नही पूछता इसदिए वह वोट ही नही देता। इ..

सोशल मीडियाApr 27, 2016

कैसे कर लेते हो यार आप लोग ये ? मज़हब का नशा क्या वाकई इतना ख़तरनाक है, इतना ज़हरीला है कि तहज़ीब की, भाषाई सभ्यता की फ़ौरन मौत हो जाती है ? अब तो दिल कर रहा है कह दूं कि भाई बुर्का पहना लो लेकिन ज़ुबान बं..

सोशल मीडियाApr 05, 2016

1996 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार मात्र 13 दिनों में गिर गयी थी, तब अटल जी ने विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लोकसभा में ज़बरदस्त भाषण दिया था। उस भाषण को आज भी याद किय..

दुःख तो बांटने से घटता है
दुःख तो बांटने से घटता हैNov 08, 2015

आप भी अपना मेकअप उतार यथार्थ में जियें- राहत महसूस करेंगें। यदि आप अन्दर से खुश हैं तो अपने आप ही मुस्कुराहट आपके चेहरे पर आ जायेगी। बनावटी खेल खेलना बंद कर दें। आप ड़रते क्यों है, आप अपनी छवि को लेकर क्यों परेशान होते हैं। सब के साथ सब घटता है। दुःख तो बांटने से घटता है।झूठी सकारात्मकता का ढोंग मत करें, जो है उसे प्रस्तुत करें।

आईना दिखाता है साहित्य
आईना दिखाता है साहित्यNov 06, 2015

एक बाहर से मजबूत दिखने वाला साम्यवादी अंदर से एक स्त्री विरोधी हो सकता है, सामंती प्रवृत्ति का हो सकता है। लेकिन उस में अपनी वाम दिशा के प्रति ईमानदारी है तो इन से लगातार लड़ता रहेगा और निखरता जाएगा। साहित्य यही भूमिका निभाता है।

इतना विवाद क्यों?
इतना विवाद क्यों?Nov 05, 2015

यह पहला मौका नहीं है जब शाहरूख ने अपने ही देश के खिलाफ टिप्पणी की है। इससे पहले भी शाहरूख ने स्वयं को सम्प्रदाय विशेष से जोड़ते हुए गैर जिम्मेदाराना बयान दिए हैं।

बीच की ज़मीनNov 04, 2015

आप स्वतंत्र होंगे, लेकिन आपके लिए बीच की ज़मीन ही नहीं छोड़ी गई है। ऐसे में स्वतंत्र होने का उद्घोष माइ नेम इज़ खान बट आइ एम नॉट ए टेररिस्ट टाइप लगता है। यह सच है कि असहिष्णुता का विरोध करने वाले अलग-अलग विचारधारात्मक खेमों से आते हैं।

वैज्ञानिक सोच का बंटाधार
वैज्ञानिक सोच का बंटाधारNov 02, 2015

बच्चों और बड़ों को भी यह बताने की जरूरत है कि विज्ञान के बिना जीवन आगे नहीं बढ़ सकता। आज से 50 साल पहले क्या किसी ने कल्पना की थी कि मोबाइल फोन की तकनीक आएगी। नहीं, न। यह विज्ञान से संभव हुआ।दिक्कत कहां है?सरकार की उपेक्षा। आगे हालात और खराब होंगे।

हर प्रतिरोध की कुछ बुनियादी मांगें होती हैं ..Oct 30, 2015

मीडिया के पास बार बार पूछ सकने का मौका होता कि बौद्धिकों की मांग पर प्रधानमंत्री का उन्हें संबोधित जवाब क्यों नहीं आ रहा .. किन्तु वे मांग करते तो संवाद का रास्ता खुलता .. एक निष्कर्ष पर पहुँचता संवाद .. जो बौद्धिक नहीं चाहते .. अगर संवाद हो गया तो उनके हाथ से यह मौका निकल जाएगा .. मौका दक्षिण से निपटने का ..