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संपादकीय
तलाक...तलाक...तलाक...... क्यों?
तलाक...तलाक...तलाक...... क्यों?Sep 04, 2016

यहां यह बताना लाजमी है कि हाल के कुछ वर्षों में तलाक की कई ऐसी घटनाएं सामने आई जिसकी वजह से तीन तलाक का मसला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि तीन तलाक महिलाओं को आत्म सम्मान और समान अधिकार के हक से वंचित करता है। किसी ने अपनी पत्नी को चिट्ठी लिखकर तलाक दे दिया तो किसी ने वाट्सअप पर मेसेज करके अपनी पत्नी को तलाक दे दिया।

इन्टर्नशिप के लोलीपॉप से चला रहे हैं पत्रकारिता का धंधा....
इन्टर्नशिप के लोलीपॉप से चला रहे हैं पत्रकारिता का धंधा....Aug 29, 2016

पूरी देश-दुनिया में हो रहे धांधली की खबरों को दिखाने वाला मीडिया स्वंय के घर की धांधली को नहीं दिखा पा रहा है और नहीं दिखाना चाहता है। न तो इस ओर किसी समाजिक संस्था की नजर पड़ती है औ न हीं किसी सरकारी विभाग का कि आखिर क्यों मीड़िया कर्मियों को उनका उचित हक नहीं मिल पा रहा है, उन्हें क्यों शोषित होना पड़ रहा है?

राजनीति और व्यवसायिकता की अंधेरी गलियों में गुम होता जा रहा है पत्रकारिता....
राजनीति और व्यवसायिकता की अंधेरी गलियों में गुम होता जा रहा है पत्रकारिता....Aug 22, 2016

आज की पत्रकारिता का स्वरूप राजनीतिक हो गई है। प्रत्येक समाचार पत्र या फिर टीवी चैनल सिर्फ वहीं खबरें प्रमुखता से लिखती है या दिखाती है जिससे उसका सरोकार है न कि जनता से या समाज से। कहने को कभी-कभी गाहे-बगाहे समाज में फैले ज्वलंनतशील मुद्दे पर पत्रकारिता के सही रूप को पेश करने की कोशिश भी करते हैं ताकि मासूम भोली-भाली जनता को यह न लगे कि पत्रकार अब हमारी बातें नहीं सुनते हैं।

जेटली का पाकिस्‍तान न जाना, कितना सही : डॉ. मयंक चतुर्वेदी
जेटली का पाकिस्‍तान न जाना, कितना सही : डॉ. मयंक चतुर्वेदीAug 17, 2016

यदि सार्क संगठन के इतिहास को देखें तो 1970 के दशक में बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान ने दक्षिण एशियाई देशों के एक व्यापार गुट के गठन का प्रस्ताव किया था, जिसके बाद मई 1980 में दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग का विचार फिर सामने आया।

जीएसटी से होगा 21वीं सदी का क्रांतिकारी आर्थिक सुधार : भरतचन्द्र नायक
जीएसटी से होगा 21वीं सदी का क्रांतिकारी आर्थिक सुधार : भरतचन्द्र नायकAug 16, 2016

आम आदमी प्रभावित होने वाला नहीं है। उदाहरण के तौर पर पिछड़ेपन से ग्रसित राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश उपभोक्ता राज्य है, इनकी अर्थव्यवस्था पर इससे अनुकूल असर पड़ेगा। उपभोक्ता राज्यों में कर संग्रह अधिक होगा। क्योंकि मौजूदा हाल में उपभोक्ता राज्य 20 से 30 प्रतिशत कर चुकाते है, वह घटकर 16 से 18 जो भी निर्धारित होगा रह जायेगा।

आजादी के सही मायने क्या हैं.....
आजादी के सही मायने क्या हैं.....Aug 14, 2016

देश को स्वतंत्रत हुए 69 वर्ष हो गये हैं लेकिन आज भी हमारे देश की स्थिति आर्थिक, समाजिक और राजनैतिक रूप से विश्व के अन्य कुछ छोटे देशों से भी पीछे खड़ा है। इस समय देश की स्थिति इतनी विचित्र है कि धनपतियों की संख्या बढ़ने के साथ गरीबी के नीचे रहने वालों की संख्या उनसे कई गुना बढ़ी है।

मोदी-मोदी के जाप ने बिगाड़ा
मोदी-मोदी के जाप ने बिगाड़ा "आप" का खेल, दिल्ली वालों के सपने रह जाएंगे अधूरे???Aug 11, 2016

हालांकि यह भी सत्य है कि राजनीति को नई दिशा से देखने वाले केजरीवाल की अभी तक किसी भी मामले में कोई परिपक्वता नहीं दिखाई दी है और न ही जनप्रतिनिधियों को देखकर लगता है कि वह पद की गरिमा को भलि-भांति समझते हैं।

मोदी-मोदी के जाप ने बिगाड़ा
मोदी-मोदी के जाप ने बिगाड़ा "आप" का खेल, दिल्ली वालों के सपने रह जाएंगे अधूरेAug 07, 2016

अब इन तमाम मामलों पर गोर करने के बाद एक आम जन यह सोचने को मजबूर है कि क्या सच में 'आप' पार्टी किसी राजनीति का शिकार हो रही है, या फिर उसके फर्जी विधायकों से पार्टी की सच्चाई सामने आ रही है।

आधुनिकता की आड़ में छिन रहा है बच्चों का बचपन
आधुनिकता की आड़ में छिन रहा है बच्चों का बचपनJul 25, 2016

आधुनिकरण की चकाचौंध से जहां हम एक ओर आज एक नई ईतिहास रच रहे हैं, जीवन शैली को आसान बना रहे हैं, और तो और अपने भविष्य के साथ अपने बच्चों अर्थात आने वाली पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित और आसान बनाने की भरसक प्रयास कर रहे हैं। लेकिन क्या यह सच है? नहीं..! हम सिर्फ अपने स्वार्थहित में सर्वविदित सत्य को नकार रहे हैं और इसी का परिणाम है कि आज हमारे सामने अर्थात इस संसार में समस्याओं का अंबार लग गया है और हम सब उससे पीछा छुड़ाने को बेताब हुए असहाय पड़े हुए हैं। और इन समस्याओं के लिए सिर्फ और सिर्फ मानव जाति के प्राणी हीं गुनहगार हैं।

हम हैं युवा “शक्ति”
हम हैं युवा “शक्ति”Jul 23, 2016

आज की युवा पीढ़ी अब आधुनिकरण की चोला पहनकर सामाजिक समरसता को देख रहा है। आज की दूरदर्शन संसकृति ने युवा पीढ़ी को अपनी ओर बहुत तेज गति से आकर्षित किया है और अपनी माया जाल में इस कदर उलझाया दिया है कि वह सभ्य और असभ्य की परिभाष भी भूल चुका है।

आधुनिकता की आड़ में छिन रहा है बच्चों का बचपनआधुनिकता की आड़ में छिन रहा है बच्चों का बचपन
आधुनिकरण की चकाचौंध से जहां हम एक ओर आज एक नई ईतिहास रच रहे हैं, जीवन शैली को आसान बना रहे हैं, और तो और अपने भविष्य के साथ अपने बच्चों अर्थात आने वाली पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित और आसान बनाने की भरसक प्रयास कर रहे हैं। लेकिन क्या यह सच है? नहीं..! हम सिर्फ अपने स्वार्थहित में सर्वविदित सत्य को नकार रहे हैं और इसी का परिणाम है कि आज हमारे सामने अर्थात इस संसार में समस्याओं का अंबार लग गया है और हम सब उससे पीछा छुड़ाने को बेताब हुए असहाय पड़े हुए हैं। और इन समस्याओं के लिए सिर्फ और सिर्फ मानव जाति के प्राणी हीं गुनहगार हैं।

हम हैं युवा “शक्ति”

बुरहान की मौत से घाटी में कितना असर पड़ेगा युवाओं पर.....

उत्तर प्रदेश में भी दिखने लगी राजनीतिक हलचल