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Publish Date: Jul 25, 2016
आधुनिकता की आड़ में छिन रहा है बच्चों का बचपन
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 अनिल कुमार । नई दिल्ली

 
आधुनिकता की पहचान क्या है..? आप सोंच रहें होंगे यह कैसा सवाल है... आपका यह सोंचना बिल्कुल हीं सत्य और व्यवाहारिक है। अब जरा सोचिए आज से पचास साल या तीस साल पहले कि जिन्दगी और आज की जिन्दगी को जीने के तरीके एवं रहन-सहन व खान-पान के बारे में... तो साफ-साफ एक स्वच्छ तस्वीर उभर कर मन के मस्तिष्क पटल पर आएगा जो हर सवाल के जवाब को अपने आप बयां कर देगा।
आधुनिकरण की चकाचौंध से जहां हम एक ओर आज एक नई ईतिहास रच रहे हैं, जीवन शैली को आसान बना रहे हैं, और तो और अपने भविष्य के साथ अपने बच्चों अर्थात आने वाली पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित और आसान बनाने की भरसक प्रयास कर रहे हैं। लेकिन क्या यह सच है? नहीं..! हम सिर्फ अपने स्वार्थहित में सर्वविदित सत्य को नकार रहे हैं और इसी का परिणाम है कि आज हमारे सामने अर्थात इस संसार में समस्याओं का अंबार लग गया है और हम सब उससे पीछा छुड़ाने को बेताब हुए असहाय पड़े हुए हैं। और इन समस्याओं के लिए सिर्फ और सिर्फ मानव जाति के प्राणी हीं गुनहगार हैं। 
हालांकि यह भी सत्य है कि मानव ने काफी तरक्की की है लेकिन उस तरक्की की आड़ में हजारों समस्याओं को जन्म दिया है। ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण में बढ़ता प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, असमान मौसम चक्र, बिगड़ता हुआ खाद्य श्रृंख्ला, बच्चों से लेकर बड़ों तक में असामान्य बिमारियों का जन्म, महिलाओं में बढ़ रही खून की कमी, बढ़ती जनसंख्या, असामान्य महिला-पुरूषों की संख्या, समाज में बढ़ रही आपराधिक घटनाएं, बिगड़ता समाजिक संरचना, आदि हजारों तरह की समस्याएं हैं जिससे आज पूरी दुनिया के लोग जूझ रहे हैं, जिसके लिए वह स्वंय जिम्मेदार है।
इंसान ने अपनी सुख-सुविधा के अनुरूप हजारों मशीनरी समानों का आविष्कार किया और अपनी दिनचर्या को आसान बनाने का प्रयास किय़ा परन्तु इन मशीनरी आविष्कारों का इस्तेमाल मनुष्यों ने गलत तरीके से करना शुरू किया और इसका प्रभाव सीधे-सीधे उनके शारीरिक विकास पर पड़ना शुरू हो गया। साथ हीं प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर मशीनरी साजो सामान का आविष्कार करने के कारण आज इंसान के साथ साथ पेड़-पौधे, जानवर, पक्षी आदि असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। कई ऐसे पक्षि, जानवर और पेड़-पौधे विलुप्त हो चुके हैं तो कई विलुप्त होने के कगार पर खड़े हैं। कुछ पक्षियों और जानवरों की संख्या तो उंगलियों में हीं गिनी जा सकती है।
आज हर बच्चे से लेकर बड़े के पास कोई न कोई इलेक्ट्रॉनिक सामान आपको मिल जाएगा। इलेक्ट्रॉनिक सामान ने हमारी जिन्दगी तो आसान बनाया लेकिन इसके कई नाकारात्मक प्रभाव भी हमारे सामने उत्पन्न हुए हैं। इलेक्ट्रॉनिक सामानों के स्क्रीन से निकलने वाले हानिकारक रेड़िएशन हमारे शारीरिक विकास को अवरूद्ध करता है और बच्चों के मानसिक विकास के साथ साथ शारीरिक विकास पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालता है। छोटे से छोटे बच्चों को कुर्सियों पर बैठाना और स्ट्रैप लगा देना या फिर स्मार्टफोन और टैबलेट खेलने के लिए हाथ में पकड़ा देना, ये सब बच्चों के लिए घातक साबित हो रहे हैं। वह शारीरिक रुप से मजबूत नहीं हो पाता है और फिर इसका बुरा असर उसके मानसिक प्रभाव पर पड़ता है और इन सबका बाद में बच्चों के जीवन पर बुरा असर पड़ता है।
आज के मां-बाप जीवन की इस आपाधापी में लगातार भागते चले जा रहे हैं, वे घर-परिवार और बच्चों के लिए समय हीं नहीं दे पा रहे हैं। वे किड़्स गार्ड़न और ऐसे हीं कई संस्थान हैं जो पैसे लेकर बच्चों की देखभाल करते हैं, उनके भरोसे बच्चों को छोड़कर वे अपने जॉब पर ध्यान केंद्रित करते हैं। लेकिन यह परम सत्य है कि एक बच्चे में व्यवहारिक ज्ञान उनके माता-पिता द्वारा हीं मिलती है। कई संस्थानों ने अध्ययन कर यह बताया है कि एक बच्चे का मानसिक विकास उनके माता-पिता के साथ रहने से ज्यादा होता है और दमाग पर साकारात्मक असर पड़ता है जिससे वह जीवन में एक नई कामयाबी को प्राप्त करता है। कई संस्थानों ने अपने सर्वें में यह बताने का प्रयास किया है कि पांच से दस साल के बच्चों के साथा माता-पिता के रहने पर भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर किस तरह से स्थायी प्रभाव पड़ता है।
आज कल स्मार्ट फोन और कम्प्यूटर का जमाना है और लगभग हर परिवार में एक न एक स्मार्ट फोन तो आपको मिल हीं जाएगा। बच्चे से दूर रहने वाले मां-बाप स्मार्ट फोन या कम्प्यूटर पर हीं चैट के जरिए बातचीत कर लेते हैं अब ऐसे में एक बच्चे के मानसिक विकास या सामाजिक व्यवहारिक ज्ञान का विकास कैसे हो सकता है। यह तो वहीं तरीका हो गया कि एक मां ने बच्चे को जन्म तो दिया जरूर लेकिन अपने दूध की जगह बोतल की दूध को पिलाया। अब एक मां के दूध में जो ताकत होगा वह क्या बंद बोतल की दूध में मिल पाएगा। विज्ञान और डॉक्टरों ने भी माना है कि मां का पीला और गाढ़ा दूध हीं बच्चे के संपूर्ण विकास में सहभागी होता है। डॉक्टरों का मानना है कि नवजात बच्चों को चलने-फिरने और नई चीज़ों को जानने का मौका चाहिए होता है जिससे उनका समग्र विकास निर्भर होता है और तो और बच्चों में संतुलन, समन्वय और ध्यान जैसी अवधारणां शुरुआती 36 महीनों में ही विकसित होती हैं। इसलिए हमें बच्चों के बचपन्न के साथ खिलवाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है। हम माता-पिता को यह समझना जरूरी है कि जीवन के इस आपाधापी में भागना जरूरी तो है लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी उनके अपने बच्चे के संपूर्ण विकास करना जरूरी है जिससे वह आगे बड़ा होकर बेहतर भविष्य़ की कल्पना कर सके और आनंददायी जीवन के साथ सम्मान व प्रतिष्ठा की जिन्दगी जी सके। हम आधुनिकरण के खिलाफ नहीं है लेकिन आधुनिकरण की आड़ में एक बच्चे का बच्पन्न छिन जाए.. किसी परिवार का घर बिखर जाए, समाज में अशांति फैल जाए.... हमारा पर्यावरण चक्र असंतुलित हो जाए.. हम इसके खिलाफ है।
 
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