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संपादकीय
Publish Date: Jul 23, 2016
हम हैं युवा “शक्ति”
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 अनिल कुमार। नई दिल्ली

किसी राष्ट्र के उत्थान और कल्याण में युवा जगत के लोगों का बहुत बड़ा सहयोग होता है इसलिए युवा शक्ति और युवा कंधों को किसी भी देश व समाज की अमूल्य धरोहर और बहुमूल्य सम्पदा माना गया है। ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ कहने और लिखने की बातें हैं बल्कि हर क्षण व हर समयकाल में युवाओं ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि असली धरोहर और देश की दिशा व दशा बदलने वाली ताकत युवा पीढ़ी होती है। युवाओ में अंसभव के पार देखने की अद्भुत क्षमता होती है और यही जोश एवं असंभव को संभव करने की ताकत रखने वाले युवाओं के कारण हीं समाज सदैव ऐसे युवा शक्ति को नमन करता है और एक आशा भरी नजरों से देखता है।

किसी भी सभ्य समाज के निर्माण में धार्मिक सद्भाव, सहयोग, उत्सव, कला, साहित्य, संगीत, आपसी भाईचारा आदि सांस्कृतिक अंगों की नीव रखी जाती है जिसकी बुनियाद पर युवा शक्ति मजबूती के साथ देश व समाज को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। सभ्य समाज सदैव अपने पैरों पर खड़ा रहता है और सामाजिक सौहार्द व कल्याण के लिए कभी किसी पर निर्भर नहीं रहता। यही कारण है कि एक सभ्य समाज में अलग-अलग जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ण के रहने के बावजूद भी वह समाज तरक्की और उत्थान की ओर अग्रसर रहता है। वहां कभी भी सांप्रदायिक सौहार्द नहीं बिगड़ता है।

एक सभ्य समाज में रहने वाला युवा शक्ति किसी भी अन्यायपूर्ण प्रस्ताव को किसी भी लालच में आकर स्वीकार नहीं कर सकता है। वह सदैव समाज और संगठन के हित को देखते हुए उसे अस्वीकार कर देता है। इससे समाज व संगठन दोनों अपने युवा शक्ति पर गौरव महसूस करता है और समाज उन्नति के पथ पर अग्रसर रहता है। किसी भी सभ्य समाज में संस्कृति को जीवित रखने की आवश्यकता होती है चूंकि संस्कृति से समाज और संगठन को मजबूती मिलती है। जो समाज व संगठन अपने युवा पीढ़ी के बारे में सोंचता है, उसकी चिंतन-मनन करता है उस समाजिक संगठन का भविष्य अपने आप सुन्दर और मनोरम हो जाता है।

जिस व्यक्ति के अंदर समाजिक समरसता व अखण्डता की भावना कूट-कूट कर भरी हो वही व्यक्ति एक संगठन के निर्माण में दक्ष व सक्षम होता है। आज की हमारी युवा पीढ़ी के सामने हजारों प्रकार की चुनौतियां मुंह खोले खड़ी है। इसलिए समाजिक समरसता को बनाए रखने व युवा शक्ति में एक नया जोश को पैदा करने के लिए तथा संस्कृति को जीवित रखने के लिए एक संगठन का हीं दायित्व नहीं है बल्कि हर उस व्यक्ति का है जो उस समाज में रहता है और उस संगठन हा हिस्सा है। हम सब को अपने-अपने कर्तव्यों और अधिकारों का निर्वहन सहयोगपूर्ण तरीके से करें तो हमारा समाज व संस्कृति अपने-आप युवा पीढ़ी के साथ मजबूत हो जाएगा।

इतिहास गवाह रहा है कि युवा पीढ़ी ने हमेशा मानवीय मूल्य़ों की रक्षा के लिए निःस्वार्थ भाव से अपने प्राण को समाज व देश के लिए समर्पित किया है। कभी समाज को समाजिक कुरीतियों से निकाला है तो कभी अन्याय, शोषण और उत्पीडन के खण्डहरों से समाज को इन्हीं युवा हाथों ने निकाला है। जहां अपनी खिलती जवानी में हीं देश के लिए युवा शक्ति ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया तो वहीं युवा शक्ति ने आसमान को भी नाप कर उसे छोटा बना दिया। इसलिए हर युवा वर्ग को अपने जातीय संगठन में अनेक प्रकार से योगदान करना चाहिए और उसे अपने जाति, समाज, व संगठन का आदर करना चाहिए साथ हीं साध उसे अपने जीवन में भी उतारना चाहिए। युवा शक्ति को अपने जातिय संगठन में एकता की भावना पैदा करना चाहिए और अन्य किसी भी प्रकार की षडयंत्रों से दूर रहकर हमेशा अपने सामाजिक संगठन के उत्थान व देश की प्रगति में योगदान करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।

हमारा समाज और देश एक जातीय संगठन का विशाल परिवार या समूह है। जो भमिका एक युवा वर्ग की उसके परिवार के लिए होता है वहीं भूमिका देश व संगठन के लिए होनी चाहिए। चूंकि किसी भी संगठन व समाज का भविष्य उसके युवा वर्ग पर हीं निर्भर करता है। समाज व सामाजिक संगठन का विकास व उत्थान स बात पर निर्भर करता है कि युवा वर्ग क्या सोंचता है और उसके लिए क्या कर रहा है। अत: युवा वर्ग को अपने उत्तरदायित्व का पालन हर संभव करना चाहिए। उसे किसी रूप में एक कठपुतली की तरह नहीं बल्कि एक रिंग मास्टर की तरह हीं व्यवहार करना चाहिए जिससे उसका समाज व सामाजिक संगठन संपूर्ण रूप से विकसित हो सके।

आज की युवा पीढ़ी अब आधुनिकरण की चोला पहनकर सामाजिक समरसता को देख रहा है। आज की दूरदर्शन संसकृति ने युवा पीढ़ी को अपनी ओर बहुत तेज गति से आकर्षित किया है और अपनी माया जाल में इस कदर उलझाया दिया है कि वह सभ्य और असभ्य की परिभाष भी भूल चुका है। उसे अब देश व सभ्य समाज के निर्माण की चिंता नहीं बल्कि स्वंय के उत्थान की चिंता होती है। इसलिए वे अपनी सामाजिक संस्कृति और सभ्य आचरण को छोड़कर पश्चिमी संस्कृति के रंग में रंगने लगा है। और इसका दुष्परिणाम हम सब के सामने दिखने लगा है, हर घर-परिवार में अब इसे महसूस किया जा सकता है। इसलिए अब समय आ गया है कि फिर से युवा शक्ति के शक्ति को जगाना है उसे अपने संस्कृति और समाज के साथ जोड़ना है तभी तो हमारा समाज व देश प्रगति के मार्ग पर अग्रसर रहकर उत्थान की ओर आगे बढ़ेगा और एक बार फिर से हम विश्व महागुरू बन सकेगें। 

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