Monday, October 23, 2017 Newslinecompact.com अपना होमपेज बनाएं |
newslinecompact Logo
banner add
अपनी बात
Publish Date: Jul 23, 2016
बुरहान की मौत से घाटी में कितना असर पड़ेगा युवाओं पर.....
title=


 अनिल कुमार। नईदिल्ली।

धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर घाटी में आखिर बिगड़े हालात के लिए जिम्मेदार कौन है? कश्मीर घाटी को अशांत करने वाले आतंकवादी बुरहान वानी की सुरक्षा बलों के द्वारा मारे जाने के बाद कश्मीर में भड़की हिंसक प्रदर्शन का जवाबदेह कौन है? इसका जवाब तो हर कोई अपनी नफा-नुकसान को देखकर हीं देगा लेकिन यहां सवाल किसी एक एक फायदे या नुकसान का नहीं बल्कि राष्ट्रहित और कश्मीर के आवाम की है।  आतंकवादी बुरहान वानी की सुरक्षा बलों के हाथों मौत के बाद कश्मीर में जारी हिंसक प्रदर्शन, पत्थरबाजी और आगजनी के बीच 30 से अधिक प्रदर्शनकारियों की मौत के बाद वहां के हालात को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक है। कश्मीर के दशकों पुराने लंबित और कथित समाधान की शिकायतें इस प्रकार के प्रत्येक दौर के साथ और उलझती जाती है। अब आने वाला समय हीं यह तय करेगा कि घाटी के युवाओं पर बुरहान की मौत का क्या असर पड़ेगा और घाटी के हालात कैसे होंगे?
आपको यह बात बतानी बेहद लाजमी और जरूरी है कि  आतंकी बुरहान वानी के जनाजे में शामिल होने वाली 20 हजार से अधिक की भीड़ में से प्रत्येक आतंकी नहीं हैं और न बनना चाहते हैं। उनमें से अधिकांश संवेदनशील होंगें जो हिंसा के समर्थक नहीं हैं और सरकार व व्यवस्था से अधिक जिम्मेदारीपूर्वक व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं। आपको एक ओर बात याद दिला दूं की यह कोई पहली घटना नहीं जिसमें एक घोषित आतंकवादी जनाजे में हजारों की संख्या में लोग जुटते हैं और अपनी भावना को प्रदर्शित करते हैं। इससे पहले आतंकी याकूब मेनन के जनाजे में भी हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए ओर अपनी संवेदना को जाहिर किया। किसी आतंकी के मारे जाने के बाद उनके जनाजे में शामिल होने वाली भीड़ को देख कर हर बार एक सवाल देश के साथ-साथ पूरे विश्वभर के सभी प्रबुद्ध और बुद्धजीवियों के जमह में आता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों हजारों की संख्या में लोग एक आतंकी के मरने में शौकाकूल होते हैं? क्यों उनके मरने पर मातम मनाया जाता है? आखिर इसकी मूल वजह क्या है? कश्मीर की मूल समस्या क्या है? बूरहान वानी की मौत के बाद ऐसा कहा जा रहा है कि कश्मीर की मूल समस्या वहां की राजनीतिक हालात हैं जिसका समाधान भी हमसब को मिलकर राजनीतिक ढ़ंग से हीं करना पड़ेगा। परन्तु अब एक सवाल यह उठता है कि कश्मीर में ऐसी राजनीतिक समस्या आखिर कब, कैसे और क्यों खड़ी हो गई?
यहां पर आपको यह बताना लाजमी है कि कश्मीर भारत में औपचारिक विलय से पहले कश्मीरियत के रूप में मानक पंथनिरपेक्षता का एक प्रतीक था। साल 1947-48 में पाकिस्तान की ओर से किए गए आतंकी और कबायली हमलों से उपजे डरावने भय का परिणाम था कि कश्मीर का विलय भारत के साथ हो गया। उसके बाद से लगातार दोनों देशों (भारत-पाकिस्तान) के बीच कश्मीर पर अपनी दावेदारी को लेकर खींचातानी और राजनीतिक प्रतिद्वंध शुरू हो गया। परिणामतः कश्मीर की समस्या साल 1949 से लेकर 1965 के बीच विशुद्ध तौर पर ‘कूटनीतिक’ रही और यह मामला अंततः पाकिस्तान की हरकतों से संयुक्त राष्ट्र में जा पहुंचा।
आपको यहां यह बताते चलूं कि साल 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए एक और युद्ध के बाद से कश्मीर की राजनीतिक स्थिति में अस्थिरता पैदा हो गई। अगले पंद्रह सालों तक कश्मीर में राजनीतिक सत्ता के लिए साजिशें होती चली गई, जिसमें मोहरे और नारे भी बदलते चले गए। इस दौर में कश्मीर की समस्या ‘राजनीतिक’ हीं थी, जब लोकतांत्रिक सरकार से की गई अपेक्षा राज्य के कुप्रबंधन और अस्थिरता में ढल गई थी। 1990 के दशक में लोगों में नाराजगी का लाभ अलगाववादी तत्वों ने भरपूर उठाया, जिसका परिणाम हुआ कि कश्मीर की कश्मीरियत और उस राज्य की पहचान मुस्लिम बहुमत पर आधारित धार्मिक पहचान के रूप में परिभाषित हुई और भारत के विचार को विफल साबित करने के लिए द्विराष्ट्रवादी पाकिस्तानी परियोजना परवान चढ़ने लगी।
यहां आपको यह भी बताते चलें कि साल 1989 में कश्मीर घाटी की अपनी मूल पहचान कश्मीरियत लगभग खत्म सी हो गई, जब कश्मीरी पंड़ितों को पूरे जनसमाज ने लगभग एकमत से जबरन निकाल दिया। जाहिर है कश्मीर अब द्विराष्ट्रवाद का पाकिस्तान समर्थित प्रतीक बन चुका था और पाकिस्तान, निर्विवाद न सही, लेकिन कश्मीर के राजनीतिक समाधान के लिए अलगाववादियों की पसंद बन गया और इन सबके बीच कश्मीरी युवाओं की सुध लेने वाला कोई भी नहीं बचा। साल 2010 आते-आते कश्मीर में पाकिस्तानी झंड़े थामने वाले युवा हाथों ने आईएस के झंड़े उठाने शुरू कर दिए और इस प्रकार कश्मीरियत और कश्मीर के युवा द्विराष्ट्रवाद की अवधारणा से निकलकर जेहादी इस्लाम की दिशा में बढ़ गया। आपको यह बात बता दूं कि ऐसा इसलिए होता चला गया क्योंकि कश्मीर का मसला अब न तो कूटनीतिक स्तर पर आगे बढ़ सका और न ही राजनीतिक समाधान और नेतृत्व राज्य को विकास की दिशा में आगे ले जा सके। दूसरी तरफ पाकिस्तान कश्मीर को हासिल करने के लिए हजारों हथकंडें अपना रहा था जिसमें वह धर्म के आधार पर कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए आतंकवाद को नैतिक-अनैतिक समर्थन की रणनीति को अनजाम दे रहा था।
आपको यहां एक ओर बात बताता चलूं कि जम्मू-कश्मीर में पहली बार भाजपा की कथित तौर पर अलगाववादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाली पीडीपी के साथ सरकार में साझेदार है। और कश्मीर घाटी के अलगाववादियों में निराशा की एक बड़ी वजह यह भी है कि महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी-बीजेपी सरकार ने राज्य में सैनिक कॉलोनी और पंड़ितों की कॉलोनी को लेकर चर्चा शुरू कर दी है। यही कारण है कि कश्मीर घाटी में मौजूदा संकट ‘एंटी इंडिया’ से आगे बढ़कर ‘एंटी हिंदु’ भी होने लगा है। फलतः अलगाववादी तत्व पाकिस्तान के साथ मिलकर लगातार कश्मीर को आजाद करने की राग को अलापते रहते हैं और अब एंटी इंडिया के साथ-साथ एंटी हिन्दू के रूप में कश्मीर के युवाओं में नफरत का बीच बो रहे हैं। जिसका परिणाम हम सबको बुरहान वानी के रूप में देखने को मिल रहा है। यहां पर एक ओर बात बताना चाहता हूं कि कश्मीर के युवाओं के बीच उत्पन्न हो रही समस्याओं का निदान बंदूक उठाना नहीं है। हर समस्या का निदान बातचीत के जरिए हीं हल हो सकता है। कश्मीर घाटी से हिंदु पहचान के आधार पर बेदखल किए गए लाखों कश्मीरी पंडितों ने अपनी निराशा के लिए हथियार उठाने का विकल्प नहीं चुना उसी प्रकार से अलगाववादियों के बहकावे में आकर कश्मीर के युवाओं को हाथ में बंदूक नहीं उठाना चाहिए बल्कि इनके समाधान के लिए एक नैतिक व अहिंसक रास्ते का विकल्प ढूंढना चाहिए।
आपको यहां यह बताना बेहद लाजमी है कि अलगाववादी कश्मीरी युवाओं को अराजकता से जोड़ने में सफल इसलिए हो जाते हैं क्योंकि दशकों के कूटनीतिक और राजनीतिक समाधान विफल हो गए हैं। कश्मीर में हमें बुरहान नहीं बल्कि उन लोगों की जिजीविषा, लगन और मेहनत से हासिल की गई सफलता की कहानियों पर मेहनत करनी होगी जो रचनात्मक और प्रेरक हैं। कश्मीर के युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए केंद्र द्वारा पिछली सरकारों के समान राज्य के लिए दिए गए विशेष 80 हजार करोड़ के पैकेज पर तेजी से काम करने की जरूरत है। युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने व आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाना पड़ेगा। क्रिकेटर परवेज रसूल और यूपीएसी जैसे संस्थानों में टॉपर आने वाले कश्मीरी युवाओं के काबिलियत को प्रचारित कर अन्य कश्मीरी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनाना होगा ताकि भटके हुए कश्मीर के युवा हाथों में बंदूक नहीं बल्कि अपनी हूनर की पहचान बनाने के लिए कलम उठाए साथ हीं वहां की राज्य सरकार और केंद्र सरकार को कश्मीर में शांति बहाली के लिए अब पुराने सपने नहीं बल्कि नये सपने और विचार युवाओं में प्ररित करने चाहिए।
 
  • Post a comment
  • Name *
  • Email address *

  • Comments *
  • Security Code *
  • captcha
  •       
    कमेंट्स कैसे लिखें !
    जिन पाठकों को हिन्दी में टाइप करना आता है, वे युनीकोड मंगल फोंट एक्टिव कर हिन्दी में सीधे टाइप कर सकते हैं। जिन्हें हिन्दी में टाइप करना नहीं आता वे Roman Hindi यानी कीबोर्ड के अंग्रेजी अक्षरों की मदद से भी हिन्दी में टाइप कर सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि आप लिखना चाहें- “भारत डिफेंस कवच एक उपयोगी पोर्टल है’, तो अंग्रेजी कीबोर्ड से टाइप करें,हर शब्द के बाद स्पेस बार दबाएंगे तो अंग्रेजी का अक्षर हिन्दी में टाइप होता चला जाएगा। यदि आप अंग्रेजी में अपने विचार टाइप करना चाहें तो वह विकल्प भी है।