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सोशल मीडिया
Publish Date: May 03, 2016
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तीस पैतीस फीसदी मतदाता किसी पार्टी का वोट बैंक नही होता। यूपी मे भी ऐसा ही है, पर उसके लिए कोई विकल्प नही दे रहा। फिर वह बिखरा हुआ भी है,अंतिम वक्त मे भी कोई उसे नही पूछता इसदिए वह वोट ही नही देता। इसके आलावा कम से कम पंद्रह बीस फीसदी लोग बेमन से या हवा देखकर ,दबाव मे ,संबंधो के फेर मे,जाति के चक्कर मे मजहब की मूर्खता मे वोट दे आते है। इस तरह पचास फीसदी से भी अधिक मतदाता लोकतंत्र संविधान मे विश्वास रखते हुए भी इन राजनैतिक दलो और नेताओ को वोट नही देना चाहता। ऐसा लगता है कि भारत का बहुमत वोटर दलीय राजनीति से ऊब चुका है। फिर भी एक झूठ फैलाया जाता है कि देश हमारे साथ है। देश किसी भी दल के साथ नही है। ये सभी दल वाले देश को दलदल मे ले जा रहे है। आखिर यह झूठ कब तक चलेगा ? और विखरे, ऊदास ऊबे लोग क्या यूं ही राह देखते रहेगे। हम भारत के लोग का असल मतलब एक सिविल सोशायटी ही समझ सकती है। वह सिविल सोशायटी कहा है ? दलो की राजनीति ने इसे बनने के पहले ही समाज को आपस मे लडा दिया है। भारत का लोकतंत्र जडो मे गहरा होते हुए भी बढिया मीठे फल देने मे असफल होता जा रहा है। फल लगते भी है तो दल उसे असमय तोडकर लोकतंत्र की चटनी ,अचार बना रहे है। इससे मुक्ति का रास्ता खोजना होगा। दलविहीन लोकतंत्र भारत की जरूरत है। यहा के लोग अच्छे है,पार्टिया लोगो को बुरा बना रही है। पार्टियो की तोड खोजनी चाहिए। एस आर शंकर की फेसबुक वॉल से।
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