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सोशल मीडिया
Publish Date: Apr 05, 2016
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1996 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार मात्र 13 दिनों में गिर गयी थी, तब अटल जी ने विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लोकसभा में ज़बरदस्त भाषण दिया था। उस भाषण को आज भी याद किया जाता है। अपने संबोधन में वाजपेयी ने महाराष्ट्र में शरद पवार द्वारा दल-बदल कराकर सत्ता हासिल करने का ज़िक्र किया था और कहा था मैं ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूँगा। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर मजबूती से पाँव जमाने के बाद भाजपा का आचरण अटल जी के उस वक्तव्य का ज़ोरदार खण्डन करता है। लगभग दो दशकों में भाजपा ने सत्ता प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार दल-बदल और ख़रीद-फ़रोख़्त का सहारा लिया है, वह संसदीय लोकतन्त्र को कलंकित करने वाला है। 1998 में कल्याण सिंह ने उत्तर प्रदेश में बसपा और कांग्रेस को तोड़कर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल की। उस वक़्त सियासी समीकरण को अपने पक्ष में करने के लिए ख़रीद-फ़रोख़्त का सहारा लिया गया और पार्टी बदलकर आये सभी विधायकों को मंत्री बना दिया गया। झारखंड में अर्जुन मुंडा ने भाजपा की सरकार बनाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा और निर्दलीय विधायकों को मंत्री पद और धन का लालच देकर अपनी ओर मिलाया। उस वक़्त तो 5 विधायकों को भाजपा ने गोवा में पाँच सितारा होटल में रखा था और उन्हें हेलिकॉप्टर से वोटिंग के लिए सीधे विधानसभा लाया गया था। अब उत्तराखंड में भाजपा ने झारखंड जैसा कारनामा दोहराया है, जब कांग्रेस के 9 बागी विधायकों को गुणगांव में पाँच सितारा होटल में हरियाणा पुलिस की सुरक्षा में 3 दिनों तक रखा गया। इससे पहले अरुणांचल प्रदेश में भाजपा ने सत्ता हासिल करने के लिए ख़रीद-फ़रोख़्त का सहारा लिया। इन सभी प्रकरणों में दल-बदल विरोधी क़ानून की खुलेआम धज्जियां उड़ायी गयीं। यह तब है जब राजीव गांधी सरकार द्वारा पारित करवाये गए इस क़ानून को वाजपेयी की राजग सरकार ने ही अधिक तर्कसंगत बनाया था। आश्चर्य होता है कि लोकतन्त्र की इस प्रकार हत्या वह पार्टी कर रही है, जो ख़ुद को पार्टी विद् डिफ़रेंस का तमग़ा देते नहीं अघाती है। देश दीपक मिश्रा की फेसबुक वॉल से।
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