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संपादकीय
Publish Date: Sep 04, 2016
तलाक...तलाक...तलाक...... क्यों?
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 अनिल कुमार । नई दिल्ली

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां सभी जाति, धर्म, वर्ण, संप्रदाय, लिंग को एक समान अधिकार प्राप्त है चाहे वह भारत के किसी भी राज्य में निवास करता हो। भारतीय संविधान सभी के लिए एकसमान है। परन्तु अपने राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ राजनीतिक दलों व समाजिक संगठनों के साथ साथ धर्मगुरूओं ने इसका नाजायज फायदा उठाने का काम किया है। परिणामतः भारतीय संविधान में वर्णित कानूनों का सही रूप से संरक्षण नहीं हो पा रहा है। किसी भी देश को सही रूप से संचालित करने के लिए तीन अंगों में बांटा गया है- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। इन्हीं तीनों अंगों के समन्वय से देश का शासन संचालित होता है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि विधायिका कानून बनाती है और न्यायपालिका समाज में उसे सही रूप से संचालित करता है। यदि किसी भी तरह से कोई किसी कानून का उल्लंघन कर समाज में अशांति फैलाता है, गैरकानूनी कार्य करता है तो न्यायपालिका कानून के दायरे में रहकर उनपर उचित कार्रवाई करता है। 
आपको यहां पर बतातें चलें कि हमारे देश में शादी एक पवित्र बंधन है लेकिन धर्म के आधार पर इसकी पवित्रता भी अब धुंधली होती जा रही है। हिन्दू धर्म में जहां शादी सात जन्मों का बंधन होता है। भारतीय संविधान के तहत हर व्यक्ति को अपना जीवनसाथी अपनी मर्जी से चुनने का अधिकार है और वह एक शादी कर सकता है परन्तु अलग-अलग धर्म में इससे इतर कई शादियां करने की इजाजत की बात धर्मगुरू बताते हैं। हालांकि कानून एक से अधिक शादी करने को अपराध मानती है। अब धर्म कानून और राष्ट्र कानून के बीच परस्पर विरोधाभाष है। लेकिन मानवता कहती है कि हर इंसान के लिए एकसमान कानून होना चाहिए। लेकिन शायद मुसलिम धर्म में महिलाओं के लिए अलग और पुरूषों के लिए अलग नियम कायदे हैं। यही कारण है कि एक महिला को तीन तलाक देकर अपने जीवन से आजाद कर देते हैं भले हीं इसमें महिला की रजामंदी  हो या न हो, वहीं पर कोई भी मुसलिम महिला अपने पति को तीन तलाक देकर अपने जीवन से मुक्त नहीं कर सकता है। अब तीन तलाक का मसला जब सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले और मुसलिम धर्म कानून अर्थात मुसलिम पर्सनल लॉ में मतभेद नजर आया। यह कोई जरूरी नहीं है कि धर्म जिस बात की इजाजत देता है किसी राष्ट्र का कानून भी उसी बात की इजाजत दे। इसलिए चाण्क्य ने कहा था कि यदि धर्म कानून और राष्ट्र के कानून में कभी किसी प्रकार का कोई मतभेद उत्पनन होता है तो राष्ट्र का कानून हीं सर्वोपरी माना जाना चाहिए। लेकिन शायद मुसलिम धर्म गुरूओं को यह बात राज नहीं आया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर यह ऐलान कर दिया कि किसी भी सूरत में मुसलिम पर्सनल लॉ को नहीं बदला जा सकता है इसलिए सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दखलअंदाजी न करें। 
आपको यहां पर बता दें कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट को दिए एक हलफ़नामे में कहा है कि समाज सुधार के नाम पर पर्सनल लॉ में बदलाव नहीं किया जा सकता है। लॉ बोर्ड के अनुसार यह इस्लाम और भारतीय संविधान के ख़िलाफ है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने एक केस की सुनवाई के दौरान सवाल किया था कि इस्लाम के अनुसार अगर कोई चार शादियां कर सकता है तो फिर दूसरी शादी के लिए तीन तलाक देने की क्या जरूरत है? आखिर तलाक...तलाक...तलाक...... क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को चुनौती देने वाली याचिका पर बोर्ड समेत केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था। इस मामले पर बोर्ड ने अपने जवाब में कहा है कि , 'समाज सुधार के नाम पर मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता और तीन तलाक की वैधता सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता।' हलफ़नामे में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक को चुनौती देने को असंवैधानिक करार दिया है। बोर्ड का कहना है कि उसके क़ानून क़ुरान और इस्लाम के पैगम्बर के उपदेशों के आधार पर तैयार किए गए हैं। 
यहां यह बताना लाजमी है कि हाल के कुछ वर्षों में तलाक की कई ऐसी घटनाएं सामने आई जिसकी वजह से तीन तलाक का मसला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि तीन तलाक महिलाओं को आत्म सम्मान और समान अधिकार के हक से वंचित करता है। किसी ने अपनी पत्नी को चिट्ठी लिखकर तलाक दे दिया तो किसी ने वाट्सअप पर मेसेज करके अपनी पत्नी को तलाक दे दिया। इसलिए पहली बार तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाली महिला शाहबानो ने अपने हक की मांग की और कहा कि धर्म के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव क्यों हो रहा है, जबकि भारतीय संविधान सभी को चाहे महिला हो या पुरूष या किसी भी धर्म संप्रादाय से संबंध रखता हो समान अधिकार देता है तो वहीं पश्चिम बंगाल की रहनेवाली इशरत ने याचिका दाखिल कर तीन तलाक़़, निकाह हलाला और बहुविवाह को अंसवैधानिक और मुस्लिम महिलाओं के गौरवपूर्ण जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन बताया।
आपको बताता चलूं कि 'ज़बानी तलाक़़, यानी तीन बार तलाक़ कहकर तलाक़ देने और दूसरे विवाह के लिए पहली पत्नी छोड़ने जैसे सवाल भारत के मुस्लिम समाज की एक बड़ी समस्या बने हुए हैं। भारत में मुसलमानों के शादी और तलाक़ जैसे मामले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बनाए हुए वर्षों पुराने क़ानूनों के तहत तय किए जाते हैं। मुसलिम धर्म गुरूओं का मानना है कि दिक्कत क़ानून में नहीं है, यह क़ानून न तो सामंतवादी दौर के हैं ना पुराने हैं। ये क़ुरान और सुन्नत की बुनियाद पर बनाए गए हैं।  यह मुस्लिम समाज का मसला है। शरीयत यह चाहती कि कोई तलाक़ न हो। शादी खत्म न हो। लेकिन अगर कोई तलाक़ लेने पर ही तुला हुआ है तो शरीयत यह कहती कि एक बार में एक तलाक़ दें। लेकिन कोई आदमी तीनों विकल्पों का इस्तेमाल कर लेता है तो हनफ़ी मसलद या इस्लाम के चारों स्कूल ऑफ थॉट मानते है कि तलाक़ हो गया। 
आपको यह बताना जरूरी समझता हूं कि विश्व के कई मुस्लिम देशों में तीन तलाक कानूनी अपराध है। कर्इ् इस्लामी देशों में अगर कोई आदमी इस तरह से तलाक़ दे देता है तो उसको सज़ा मिलती है।' हालांकि तीन तलाक के मसले को हल करने के लिए इस्ला-ए-महाशा (समाज सुधार) के नाम से पूरी मुहिम चलाई जा रही है। इसमें लोगों को इस बारे में शिक्षित और जागरूक किया जा रहा है कि शरीयत क्या चाहती है। अगर शादी हुई है तो उसको बनाए रखना चाहि। शादी ख़त्म नहीं करनी चाहिए। लेकिन किसी सूरत में अगर इसे ख़त्म करना पड़े तो उस हालत में एक तलाक़ देकर मामला ख़त्म करना चाहिए। एक तलाक़ देने के बाद यह विकल्प बचा रहता है कि आप उसके साथ में दुबारा जिंदगी गुज़ार सकते हैं। दो बार तलाक़ पर आप दुबारा शादी कर सकते हैं। तीन बार पर सब कुछ ख़त्म हो जाता है। असल समस्या है कि शरीयत पर अमल नहीं हो रहा है। (किसी भी व्यक्ति विशेष या समुदाय या धर्म को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ठेस पहुंचाने का मेरा कोई ईरादा नहीं है, यह सिर्फ मेरे अपने निजी विचार हैं।)
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