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Publish Date: Aug 29, 2016
विश्व मानचित्र पर भारतीय संस्कृति की छाप : मुजफ्फर हुसैन
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 हम आज जिस भू-भाग पर रहते हैं सर्व प्रथम उसके लिए यह निश्चित कर लें कि भारत देश से हमारा तात्पर्य क्या है। भारत का जो मानचित्र इस समय हमारे सम्मुख है क्या हम उसके संबंध में बात कर रहे हैं या फिर उस भारत के विषय में चिंतन कर रहे हैं जिसका विवरण हमारे वेदों में और अन्य प्राचीन पुस्तकों में मिलता है? भारत को यदि जमीन का टुकड़ा बतलाकर बात करें तो फिर उसका उत्तर सरल तो हो सकता है लेकिन वह संदिग्ध होगा। क्योंकि भारत मात्र उपमहाद्वीप (सब कोंटीनेंट) नहीं है। अंग्रेजों ने एक विशेष हेतु से भारत को उपमहाद्वीप की संज्ञा दी है, लेकिन जिस धरती की विरासत की हमें बात करना है वह आज के राजनीतिक भारत पर अपने विचार केंद्रित करेंगे तो इसका कोई अर्थ नहीं होगा।

पहले हमें यह समझने की आवश्यकता है कि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भारत को उपमहाद्वीप क्यों कहा? उनके सब कोंटिनेंट शब्द के पीछे एक बड़ा षड्यंत्र था। यदि भारत को महाद्वीप कह देते तो फिर प्राचीन भारत की परिभाषा में वे अपना मंतव्य व्यक्त नहीं कर सकते थे। इसलिए उपमहाद्वीप का तो अर्थ होगा कि इसमें और भी देश है। इसलिए समय आने पर उन देशों की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार उसके टुकड़े किए जा सकेंगे। उन्होंने अपनी सोची-समझी नीति के अनुसार प्राचीन भारत के अनेक टुकड़े कर दिए। 1935 के एक्ट के तहत उन्होंने नेपाल, भूटान, श्रीलंका और ब्रह्म प्रदेश (म्यांमार) को अलग भौगोलिक इकाई मानकर भारत के अंतर्गत ही अन्य देश बना दिए। उन्हें स्वतंत्र करके सार्वभौमिक सत्ता का रूप दे दिया। हद तो यह हो गई कि मालद्वीप जैसे छोटे से द्वीप को भी भारत से अलग करके एक नया सर्वभौम देश बना दिया। तिब्बत का विवरण भी इस प्रकार से कर दिया कि मानो उसका भारत से कोई संबंध ही नहीं हो। भारत को आजाद करते समय फिर यह शर्त प्रस्तुत कर दी कि धर्म के नाम पर भारत का बंटवारा अनिवार्य है। इसलिए 1947 में पाकिस्तान अस्तित्व में आया। धर्म के नाम पर देश नहीं बना करते हैं इसलिए फिर हमने देखा कि उस पाकिस्तान का एक और विभाजन हो गया और बांग्लादेश बन गया। इस प्रकार से एक नैसर्गिक भूमि के इतने टुकड़े कर दिए गए कि भारत उनकी भाषा में उपमहाद्वीप बनकर रह गया। क्या इस तोडफ़ोड़ और विभाजन की वृत्ति को एक महादेश अथवा तो उसे प्राचीन युग का महाद्वीप कह सकेंगे?
भारतीय उपमहाद्वीप में नए देश बनाने का यह सिलसिला समाप्त हो गया या फिर कोई और जमीन का टुकड़ा भारत की सीमाओं से अलग करके एक नया देश बना दिया जाएगा। भारत को तोड़कर नए देश बनाने से राजनीतिक आधार पर तो वे नए देश बन गए, लेकिन क्या यह प्राकृतिक प्रक्रिया है? क्या वे अपने आप में साधन संपन्न और राष्ट्र कहलाने वाले योग्य देश है? वास्तविकता के धरातल पर देखें तो यह सभी आधे-अधूरे देश हैं। न उनके पास प्राकृतिक सीमाएं हैं और न ही कोई अलग-थलग सांस्कृतिक विरासत। इसलिए राजनीतिक शब्दावली में देश होना और बात जबकि नैसर्गिक आधार पर राष्ट्र होना दूसरी बात है। इसलिए सांस्कृतिक विरासत तो तभी कही जाएगी जब संपूर्ण भौगोलिक इकाई पर हम चर्चा करेंगे। इस टूटे-फूटे भारत में सांस्कृतिक विरासत को दृढ़ पाना असंभव सा लगता है। हमारे वेदों के आधार पर तो भारत की सीमा वह है जहां तक हिमालय की कंदराएं फैली हुई है। यानी ईरान के तिबरेज पर्वत की श्रंृखलाओं से लगाकर इंडो, चायना और इंडोनेशिया तक फैली हिमालय की कंदराएं एवं जहां तक हिंद महासागर की लहरें धरती को चूमती है वहीं भारत की असली सीमाएं हैं। इन सीमाओं में एक विचित्र प्रकार का नैसर्गिक बंधन है। इन सीमाओं के बीच भारत एक संपूर्ण राष्ट्र की तरह विकसित हुआ है। इस भू-भाग पर फैली संस्कृति उसकी एकता और अखंडता की साक्षी थी।
 किसी देश का राजनीतिक विभाजन न तो उसकी दृढ़ता और न ही उसकी एकता का परिचायक हो सकता है। सांस्कृतिक भारत की नदियां हिमालय से निकलती थी और हिंद महासागर के अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में गिरा करती थी। लेकिन सिंध और ब्रह्मपुत्र और गंगा अब भी बहती तो उसी प्रकार है लेकिन आज के राजनीतिक विभाजन में वे पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और चीन से होकर गुजरती है। हमारी दक्षिण की नदियां आज भी हमारे ही पर्वतों से निकलती है और हमारे ही तट पर जाकर सागर में विलीन हो जाती है। हिमालय तो न जाने कितने देशों में बट गया। यानी हमारी सांस्कृतिक और प्राकृतिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई। 
अब यदि इन नदियों की घाटियों में पनपी हमारी संस्कृति की बात करें तो क्या वह केवल हमारे राष्ट्र की संस्कृति कहला सकती है। दुनिया की धरती पर बने और बसे भारत की आंतरिक और बाह्य एकता कुछ और ही थी। आज हम जिसे शक्तिपीठ कहते हैं वे तो सांस्कृतिक भारत के 52 जिले थे। जिन 12 ज्योतिर्लिंग की चर्चा करते हैं वे तो हमारे प्राचीन भारत के 12 राज्य थे जिनसे धर्म सत्ता और राज सत्ता का संचालन होता था। भारत में पद यात्राएं एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचने और उन्हें देखने एवं परिस्थितियों के अनुसार उसे एक सूत्र में बांधने की परंपरा थी। राम उत्तर से दक्षिण की यात्रा करते हैं तो कृष्ण पूर्व से पश्चिम की। शिव तो संपूर्ण भारत की एकता के सूचक हैं। इन सांस्कृतिक यात्राओं का आधार लेकर हर बड़े नेता ने देश को अपनी यात्राओं के माध्यम से जाना और पहचाना। उक्त परंपरा ने ही गांधी को संपूर्ण देश का नेता बनाया।
देश को जोडऩे के लिए ही चार दिशाओं में चार कुंभ के मेलों का आयोजन किया। हर चार वर्ष के अंतराल से यह मेले आज तक विद्यमान है। कभी सारा देश उत्तर में हरिद्वार में एकत्रित होता है तो कभी दक्षिण के नाशिक में। पूर्व में प्रयाग तो पश्चिम में उज्जैन को केंद्र बनाया। चारों मेले अपने आप में चार खुली संसद थी जो देश की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के संबंध में चर्चा करती थी और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेती थी। इस सांस्कृतिक अखंडता की रक्षा करने के लिए उन्होंने नगर भी इसी प्रकार के बसाए। यदि पूर्व में रांची है तो पश्चिम में कराची है। उत्तर में मथुरा है तो दक्षिण में मदुराई है। ढाका और ढोल का बिल्कुल एक ही अक्षांश और रेखांश पर एक-दूसरे के विपरीत बसे हुए दिखलाई पड़ते हैं। भोपाल और नेपाल, अटक और कटक ऐसे पचासों नगर भारत के मानचित्र में देखने को मिलते हैं। भारत की राजधानी दिल्ली घर की डेली के समान है। जो इसे जीत लेता था वह गौरी और बाबर बन जाता था, जो नहीं जीत पाता था वह सिकंदर और गजनी बनकर पुन: लौट जाता था। भारत एक न होता तो कालिदास का मेघदूत किस प्रकार से लिखा जाता। रामटेक की एक चट्टान पर खड़े होकर वह कहता है ओ आषाढ़ के पहले बादल...।
 कालिदास ने अपने मेघ को सारे देश में घुमाया। उस समय न तो कोई डडली का एटलस था और न ही कोई अंतरदेशीय पत्र अथवा आज का मोबाइल जिससे वह अपना संदेश भेज देता। जिसके पास ज्ञान के चक्षु हैं वह अवश्य ही करेगा अरे यह तो सांस्कृतिक धारा है जिससे इस देश का निर्माण हुआ है। यह धरती का टुकड़ा नहीं, बल्कि अपने आप में एक संस्कृति का धड़कता दिल है, यही धड़कन भारत की विरासत है। भारत की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत है। एक समय था कि यही संपूर्ण देश की भाषा थी। अपनी अभिव्यक्ति के लिए बोलियां हो सकती है। लेकिन जहां तक लिखने का सवाल था तो लिपि की आवश्यकता थी। देवनागरी लिपि का जब आविष्कार हुआ तो संस्कृत लिखी जाने लगी। इस संस्कृत को जब कृति में बदला गया तो वह शब्द संस्कृति हो गया। विदेशी भाषाओं में किसी विचार और संस्कार को कल्ट कहा जाता है। उदाहरण के लिए हिटलर कल्ट अथवा तो मुसोलिनी कल्ट। भाषा की दृष्टि से कल्ट एक वचन है, जो कल्चर के रूप में अस्तित्व में आता है।
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