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संपादकीय
Publish Date: Aug 29, 2016
इन्टर्नशिप के लोलीपॉप से चला रहे हैं पत्रकारिता का धंधा....
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 नई दिल्ली । अनिल कुमार

 
पत्रकारिता का सरोकार समाजसेवा और देशहित एवं जनहित में हुआ करता था परन्तु समाज का आईना बनकर सच्चाई से रूबरू कराने वाली पत्रकारिता अब स्वंय व्यवसायिकता और राजनीति के चकाचौंध भरी गलियारे में भर्राटे भर रही है। जैसे-जैसे समाज में उदारीकरण को लेकर जागरूकता बढ़ती गई वैसे वैसे पत्रकारिता ने भी अपने पांव समाजहित, देशहित, जनहित की भावनाओं से समेट कर व्यवसायिकता की ओर पसारने लगा। पत्रकारिता में व्यायवसाय का अर्थ सिर्फ विज्ञापन से नहीं है बल्कि पत्रकारिता की पढ़ाई को भी व्यावसाय के तौर पर अपना लिया गया है। यही कारण है कि आज हमारे देश में हजारों प्राइवेट और सरकारी शिक्षण संस्थान है जो पत्रकारिता की डिग्री दे रहें हैं। सबसे खास बात यह है कि डिग्री देने वाले संस्थानों के पास यह कोई गारंटी नहीं होती है कि उन्हें नौकरी मिलेगी नहीं, हालांकि इन्टर्नशिप देने का भरोसा जरूर देतदे हैं लेकिन वास्तविकता यही है कि प्राइवेट संस्थान इन्टर्नशिप भी नहीं दे पाते हैं। पत्रकारिता का स्वरूप अपने आप में बेहद हीं अनोखा है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आज सबसे बड़ी चुनौती हो गई है कि जो भी विद्यार्थी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं उसे जॉब मिले।
 
आपको एक बात बताता हूं कि आज पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे बच्चों की हालत कैसी हो गई है, कैसे पत्रकारिता के क्षेत्र में धांधली या कहें कि निरस्ता यहीं खत्म नहीं होती है। बल्कि पत्रकारिता को अब शिक्षण क्षेत्र से जोड़कर बहुत बड़ी धांधली की जा रही है। यदि मैं कहूं तो एक तरह से विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। पत्रकार बनाने के नाम पर कई विश्वविद्यालय और प्राइवेट शिक्षण संस्थान मोटी रकम लेकर पत्रकार बन जाने की प्रमाणपत्र देते हैं। आज हमारे देश की तमाम विश्वविद्यालय और सैंकड़ों प्राइवेट इंस्टीट्यूशन पत्रकारिता का पाठ्यक्रम चला रहे हैं। आपको जानकर यह हैरत होगा की पत्रकारिता में भी तरह-तरह के कोर्स उपलब्ध है। जैसे बीजे इन मास कॉम, बीएससी इन मास कम्यूनिकेशन, बीएससी इन इलेक्ट्रोनिक मीडिया, बीए इन जर्नलिज्म, एमए इन मास कॉम, एमएससी इन मास कम्यूनिकेशन, एमए इन जर्नलिज्म, एमजे इन मास कॉम, हिन्दी पत्रकारिता, अंग्रेजी पत्रकारिता, जर्नलिज्म इन रेडियो बॉडकास्टिंग, टेलीविजन जर्नलिज्म, पीजीडीएम इन जर्नलिज्म आदि-आदि। एक सफल पत्रकार बनाने का आश्वसन के नाम पर तमाम विश्वविद्यालय और प्राइवेट संस्थाएं लाखों रुपये फीस के रूप में छात्रों से वसूलते हैं। इन तमाम तरह के पाठ्यक्रमों की फीस कम से कम एक लाख से 5-7 लाख रुपये तक की होती है। अब इतनी भारी भरकम फीस देने के बाद भी किसी की नौकरी न लगे तो फिर उसके लिए जिम्मेदार कौन है?
आपको बताते चलें कि आज प्रत्येक बड़े ब्रांड के टीवी चैनल और अखबार स्वंय के मीडिया इंस्टीट्यूट चला रहे हैं, जहां पर हजारों बच्चे पत्रकारिता की डिग्री इस उम्मीद से ले रहे हैं कि कोर्स पूरा होने के बाद उन्हें उसी टीवी चैनल या अखबार में जॉब मिल जाएगा। इसके अलावे हमारे देश के तमाम विश्व विद्यालय और प्राइवेट मीडिया संस्थान से लाखों बच्चे हर साल पत्रकारिता की डिग्री लेकर बाहर आते हैं। अब यह सवाल उठना लाजमी है कि जब कोई टीवी चैनल या अखबार स्वंय के इंस्टीट्यीशन में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को नौकरी नहीं दे पा रहे हैं तो बाहर के किसी विश्वविद्याल और प्राइवेट संस्थान से पढ़कर आने वाले बच्चों को नौकरी कहां से दे देंगे। परिणामतः बच्चे जिस कॉलेज या इन्सटीट्यूट से पढाई कर रहे होते वहां पर अपनी फरियाद लगाते हैं कि हमें जॉब चाहिए तो उसे इंटर्नशिप के नाम पर लोलीपॉप थमा दिया जाता है और कह दिया जाता है कि पहले 3 से 6 महीने की इन्टर्नशिप करो फिर देखेंगे। मीड़िया हाउसों में इन्हीं इन्टर्नशिप करने वालों के द्वारा अधिक से अधिक कार्य करवाते हैं, और जब ज़ॉब देने की नौबत आती है तो उन्हें इन्टर्नशिप प्रमाणपत्र देकर विदा कर देते हैं।  
यहां पर आपको बताता चलूं कि जब आप किसी भी शिक्षण संस्थान में या विश्वविद्यालय में एडमिशन लेने जाते हैं या फिर इन्कवेरी करने जाते हैं तो आपके सामने एक लंबी फेहरिस्त पेश करते हुए आपको बताया जाता है कि हमारे यहां फलां-फलां सुविधाएं उपलब्ध है और अबतक हमारी यहां से पढ़ने वाले सैंकड़ों बच्चे टॉप के न्यूज चैनलों में टॉप लेवल पर जॉब कर रहे हैं। यदि आप भी हमारे यहां एडमिशन लेंगे तो हम आपको अच्छी ट्रेनिंग देकर एक कुशल एवं सक्षम पत्रकार अर्थात एक एंकर या रिपोर्टर बना देगें साथ हीं आपकी जॉब भी टॉप की न्यूज चैनल या अखबार में लगवा देगें। पत्रकारिता का पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद जब आप जॉब पर जाएंगे तो आपकी सैलरी भी कम से कम 30-35 हजार रुपये की होगी। अब ऐसे हसीन सपने को साकार होते देख भला कौन अपने आप को रोक सकता है। महज एक या दो साल की पढ़ाई करने के बाद टीवी में चमकता हुआ एक सितारा बनने का मौका और साथ हीं लाखों की सालाना इनकम, और क्या चाहिए एक सफल व्यक्ति बनने के लिए, तरह-तरह के सैंकड़ों ख्याली पुलाव मन में पकना शुरू हो जाता है, मन में ऐसे लड्डू फूटने लगते हैं कि अब तो पूरी दुनिया को समझो जीत हीं लेंगे। और आप आगे किसी भी प्रकार के इन्कवेरी किये बिना एडमिशन ले लेते हैं। छात्र यह जानने की जहमत हीं नहीं उठाते कि संस्थान जो भी कुछ कह रहा है उसमें कितनी सच्चाई है, और क्या वास्तव में हम एक या दो साल में एक कुशल पत्रकार अर्थात एंकर और रिपोर्टर बन जाएंगे।
आपको बताते चलें कि हमारे देश की कई ऐसे विश्वविद्यालय पत्रकारिता की डिग्री तो बांट रहे हैं लेकिन उनके पास बच्चों को सिखाने के पर्याप्त साधन नहीं हैं। प्राइवेट इंस्टीट्यूशन के पास नाम मात्र का साधन होते हैं और उन्हीं साधनों के बल पर छात्रों को सक्षम एवं कुशल पत्रकार बनाने का हुंकार भरते हैं। सैंकड़ों बच्चों का एडमिशन ऐसे झूठ के पुलिंदा बांध कर करवाते हैं और फिर सारे बच्चों के बीच एडजस्ट करके काम चलाने की बात करते-करते पूरा पाठ्यक्रम हीं समाप्त हो जाता है। ऐसे संस्थानों के पास न तो साजो-समान होते हैं और न हीं पत्रकारिता के कुशल एवं प्रशिक्षित शिक्षक होते हैं।
अंत में आपको एक ओर बात से रूबरू कराना चाहता हूं कि पत्रकारिता में जब आज शुरूआती जॉब करने जाते हैं तो आपकी सैलरी महज 5 से 10 हजार रुपये की होती है। इसी सैलरी में आपको कम से कम 5 से 7 साल गुजारने होते हैं तब जाकर कहीं आपकी सैलरी बढ़कर 15 या फिर 20 हजार रुपये होती है। अभी पिछले संसद के सत्र में एक श्रम कानून बना जिसके तहत अशिक्षित लोगों की मजदूरी कम से कम 14 हजार रुपये और अर्धशिक्षित को 17 हजार रुपये मिलनी चाहिए। लेकिन पूरी देश-दुनिया में हो रहे धांधली की खबरों को दिखाने वाला मीडिया स्वंय के घर की धांधली को नहीं दिखा पा रहा है और नहीं दिखाना चाहता है। न तो इस ओर किसी समाजिक संस्था की नजर पड़ती है औ न हीं किसी सरकारी विभाग का कि आखिर क्यों मीड़िया कर्मियों को उनका उचित हक नहीं मिल पा रहा है, उन्हें क्यों शोषित होना पड़ रहा है?
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