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संपादकीय
Publish Date: Aug 22, 2016
राजनीति और व्यवसायिकता की अंधेरी गलियों में गुम होता जा रहा है पत्रकारिता....
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 नई दिल्ली । अनिल कुमार

 
लोकतंत्र का अघोषित चौथा स्तंभ कहलाने वाला पत्रकारिता आज एक प्रोफेशन बन चुका है। पत्रकारिता करने का स्टाईल और पत्रकारिता का मायने हीं बदल गया है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज में जागरूकता फैलाना और खबरों और नवीन समाचारों से लोगों को अवगत कराना होता था लेकिन जब से उदारीकरण कॉन्सेपट का दौर विश्वभर में चला तब से मीड़िया या कहें कि पत्रकारिता का स्वरूप भी बदल गया है। व्यवसायिकता की अंधी दौड़ में टीवी चैनल या अखबार पत्रकारिता के मूल उद्देश्य को हीं भूल गये हैं। पत्रकारिता में अब व्यवसायिक घरानों और राजनेताओं का दबदबा हो गया है जिससे निष्पक्ष पत्रकारिता अब किसी एक पक्ष की बात करने लगा है।
आपको यहां पर बताते चलें कि पत्रकारिता का संदर्भ और पत्रकारों की जिज्ञासा में बदलाव आ चुका है। आज आप यदि किसी भी अखबार या समाचार पत्र को देखें तो आपको पता चल जाएगा कि उसकी स्टाईल क्या है। वह किस दिशा में सोचते हैं और समाजहित में पत्रकार अपनी कितनी भूमिका निभा रहे हैं। टीवी पर आने वाले तथाकथित स्वंय को सर्वज्ञानी बताने वाले पत्रकार किसी भी विषय पर समाज को क्या दिखाते हैं और उसका प्रभाव समाज पर क्या पड़ता है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है। चैनल को तो सिर्फ टीआरपी से मतलब है। उसका चैनल सभी को पछाड़ते हुए सबसे आगे रहे और गर्व से वह विज्ञापन चला कर बता सके कि देश का नंबर वन चैनल वह है एवं समाजहित एवं देशहित में उसने कई महान कार्यक्रम चलाए हैं और आज भी समाज का सच्चा प्रहरी बनकर आपकी आवाज को हम देश के सामने लाते हैं। आज सैंकड़ों टीवी चैनल और अखबार हमारे बीच दिन भर समाचार को प्रस्तुत करने का काम कर रहे हैं उसमें सोशल मीड़िया खबरों के प्रवाह में चार चांद लगा रहा है। लेकिन क्या वास्तव में जितनी खबरें दिखाई जाती है या फिर अखबारों में छपकर हमारे घरों तक आती है या फिर सोशल मीड़िया पर पल-पल अपडेट होने वाली खबर समाज को सही दिशा देने वाला होता है, ज्ञानवर्धक होता है? इसका जवाब तो हर कोई अपने अनुसार हीं देगा क्योंकि हम लोकतांत्रिक देश में रहते हैं जहां सबको सबकुछ कहने, सुनाने, लिखने, छापने, बोलने, दिखाने की आजादी है।
आपको यहां पर बताना लाजमी समझता हूं कि आज की पत्रकारिता का स्वरूप राजनीतिक हो गई है। प्रत्येक समाचार पत्र या फिर टीवी चैनल सिर्फ वहीं खबरें प्रमुखता से लिखती है या दिखाती है जिससे उसका सरोकार है न कि जनता से या समाज से। कहने को कभी-कभी गाहे-बगाहे समाज में फैले ज्वलंनतशील मुद्दे पर पत्रकारिता के सही रूप को पेश करने की कोशिश भी करते हैं ताकि मासूम भोली-भाली जनता को यह न लगे कि पत्रकार अब हमारी बातें नहीं सुनते हैं। आज की पत्रकारिता को देख कर यही लगता है कि " पत्रकार अब राजनीति की अंधेरी कोठियों में नाचने वाली तवायफ बन चुके हैं, जो सिर्फ अपने कोठे के मालिक या मालकिन के इशारे पर हीं धंधा करती है"। पत्रकारिता राजनीति और व्यवसायिकता की अंधेरी गलियों में कहीं गुम होता चला जा रहा है। आज हर पत्रकार सिर्फ और सिर्फ राजनेताओं के चक्कर काट रहे हैं। उन्हें समाजहित, देशहित और जनहित से कोई मतलब हीं नहीं है। स्वंय का भला हो यही सबसे बड़ी बात है। टीवी पर दिनभर ऐसे खबरों को परोसा जाता है जिसका जनसरोकार से कोई सीधा मतलब नहीं है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता इसी संदर्भ में अब धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। 
आपको यहां पर मैं अवगत कराना चाहता हूं कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज के सामने किसी भी घटना के सत्य को उजागर करना तथा सरकार के जनहित कार्यों को आवाम तक पहुंचाना एवं समाज को शिक्षित ताथ मनोरंजित करना होता था। लेकिन पत्रकारिता अपने मूल उद्देश से भटक चुकी है। आज कोई भी टीवी चैनल या समाचार पत्र सरकार के जनहित कार्यों के सकारात्मक और नकारात्मक तथ्य को समाज के सामने रखने में रूचि नहीं रखती है। आज की पत्रकारिता को तो चाहिए नेताओं द्वारा दिए गये भाषण में भड़काऊ क्या था, किस नेता ने किसके लिए क्या कहा, कहां पर भारत माता की जय बोला जा रहा है और कौन नहीं बोल रहा है, कोई क्यों नहीं बोल रहा है, प्रधानमंत्री ने किसी मुद्दे पर अब तक बयान क्यों नहीं दिया, आदि। लेकिन एक आम आदमी को इन मामलों से क्या मतलब, उन्हें तो जरूरत होती है सरकारी योजनाओं के लाभ की जिसका उन्हें किसी भी सूरत में पता नहीं चल पाता है। एक आदमी इस उम्मीद से टीवी देखता है या अखबार पढ़ता है कि उसे कहीं से जानकारी मिल जाए कि सरकार ने उसके लिए कौन सी लाभकारी योजनाएं चलाई है, हमारे लिए गांव में किस प्रकार का विकास कार्य सरकार करवा रही है आदि। परन्तु समाचार चैनलों व समाचार पत्रों को इन सबसे क्या मतलब कि आम आदमी को सरकारी योजनाओं का पता है या नहीं है। उन्हें तो सिर्फ इस बात से मतलब है कि कितने लोग इसके चैनल को देख रहे हैं या कितने लोग मेरे अखबार को पढ़ रहे हैं। पत्रकार को सिर्फ इस बात से मतलब होता है कि कौन सा नेता या मंत्री उसके संपर्क में हैं और उनसे उनको कितना पैसा किसी भी खबर को चलाने या अखबार में लिखने के लिए मिलता है। क्योंकि कहा गया है कि बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपया। जिसके पास पैसा होगा समाज में उसकी इज्जत भी होगी और उसका रूतबा एवं ठाठ भी होगा। ऐसे भी हमारे समाज में पत्रकारों द्वारा कही गई बात अर्थात टीवी में दिखने वाला प्रत्येक खबर या अखबार में छपने वाला हर खबर परम सत्य होता है, उसे भगवान भी झूठला नहीं सकता है। यही कारण है कि टीवी में दिखने वाला हर खबर और अखबार में छपने वाला हर समाचार को जनता सत्य मान लेती है। क्योंकि पत्रकार हमेशा से समाज को दिशा देते आए हैं और समाज को जागरूक करते आई है, लेकिन आज की बदली हुई परिस्थिति को आम जनता कहां समझ पा रही है। हर टीवी चैनल या अखबार तो किसी न किसी राजनीतिक पार्टी विशेष के लिए किसी न किसी रूप में कार्य कर रही है। कोई किसी का खुलकर समर्थन कर रहा है तो कोई पीछे के दरवाजे से सपोर्ट कर रहे हैं।
(यह लेख मेरे द्वारा लिखित मेरे अपने विचार हैं, यदि किसी भी व्यक्ति या संस्था को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ठेस पहुंच रहा हो तो उसके लिए मैं क्षमाचाक हूं।)
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