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Publish Date: Aug 15, 2016
जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़ियाँ करती हैं बसेरा ,वो भारत देश है मेरा.....
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नई दिल्ली

शुभम कुमार गुप्ता

 

“जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़ियाँ करती हैं बसेरा ,वो भारत देश है मेरा ” जब इस तरह के देशभक्ति गीतों की अलाप हमे सुनाई देती है तो भारतीय होने पर हमे एक गर्व सा महसूस होता है। 15 अगस्त 2016 को भारत अपने आजादी के 69 वर्ष पुरे कर लेगा और और पुरा देश हर्षोल्लास के साथ आजादी के 70वें वर्षगांठ को मनायेगा। स्वाधीनता के इस लम्बे और गौरवशाली सफर में देश ने बहुत कुछ अर्जित किया है, आज स्तिथि यह है की पूरा विश्व भारत से तमाम तरह की उम्मीदे लगाये हुए है। भारत की जनता भी इन उम्मीदों के हिसाब से आगे बढ़ने को तटपर है ,पर अफ़सोस की बात यह है की आजादी के 69 वर्ष बाद भी भारत आज विकसित देशों की श्रेणी में नही गिना जाता है। आज उन संकल्पो को दोहराना सबसे महत्वपूर्ण है जो हमने स्वंत्रता संग्राम के दौरान लिए थे। 15 अगस्त ,1947 को जब पूरा विश्व सो रहा था , भारत की जनता का अपनी आजादी से मिलान हो रहा था। उस समय प्रथम प्रधानमंत्री बनाये गए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था की यह आजादी एक ऐसा समय है जब किसी राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्ति मिलती है। यह वही समय है जिसमे हमे अपने संकल्पो को दोहराने का स्वर्णिम अवसर मिला। जवाहरलाल नेहरू के अनुसार उन संकल्पो में से देश ,जनता और मानवता की सेवा करना था,लेकिन आजादी के 69 वर्ष बाद भी हमे यह गहन तरीके से सोचने की जरूरत है क्या वास्तव में हमे आज वह संकल्प याद है जिसका सपना प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के समय देखा था ? जरूरी है की वर्तमान और आने वाली पीढ़ी को उन संकल्पो के अर्थ और भाव समझाए जाये। शिक्षा एकमात्र साधन है ,लेकिन अगर देश में सबसे ज्यादा कही कमजोरी आई है तो वह है शिक्षा के क्षेत्र में। शिक्षा का जिस तरह से व्यवसायीकरण हुआ है वह आने वाले समय के लिए खतरे की घंटी है।

 

 

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकत्रांतिक गणराज्य है ,पर लोकत्रांतिक तरीके से चलने वाले भारत में आज राजनितिक दशा की अभिव्यक्ति भी लोकतंत्र के “मंदिर” में देखने को मिल ही जाता है। स्वाधीनता दिवस के पूर्ण संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने सन्देश में राष्ट्रपति ने यह कहकर जन भावनाओं को ही अभिव्यक्त किया की ” संसद चर्चा के बजाय लड़ाई का मैदान बन गयी है। “विडंबना यह है की जिन राजनितिक दलो के कारण संसद अखाडा बनी उनके रुख-रवैये में कोई बदलाव आता नही दिख रहा है।

 

 

देश ने अनेक उतार-चढ़ाव देखें , कई युद्धों की विभीषिका झेली, लोकतंत्र पर प्रहार देखे, देश का सोना विदेशों में गिरवी रख देश की समस्याओं से निपटे, साम्प्रदायिक और जातिय हिंसा से जूझे ,सूखे-बाढ़, भूकम्प की त्रासदी से दो- चार हुए तथा कई नेताओं का बलिदान देखा , पर इन सबके बावजूद भारत ने विश्व में अपनी एक पहचान बनायीं और दुनिया के लोग भारत की ओर इज़्ज़त से देखतें हैं। कभी भारत को विश्व गुरु के रूप में माना जाता था , आज वैश्विक समुदाय द्वारा पुनः भारत से वैश्विक नेतृत्व की अपेछा की जा रही है, लेकिन क्या स्वंत्रता के 69 वर्ष बाद भी हम अपने को उस अपेछा के अनुरूप बना पा रहे है ? यह एक बड़ा प्रश्न है जिसपर सोचने की सख्त जरूरत है।

 

 

69 वर्षो की स्वन्त्रता यात्रा कठोर ,यातनाओ से परिपूर्ण और सहीदो के बलिदानो से भरी पड़ी है। 1885 में कांग्रेस के नेतृत्व में इस लम्बी लड़ाई की शुरुआत हुयी, हलाकि पूरा देश ही उस समय कांग्रेस था। कांग्रेस में नरम और गरम दोनों तरह के लोग थे जो क्रमशः शांति और क्रांति दोनों तरह के प्रयोग करना चाहते थे। हर गावं एयर शहर में ऐसे असंख्य वीरों ने स्वंत्रता आंदोलन में अपने प्राणो की आहुति दे दी , पर विडंबना तो देखिये कि हम उनको जानते तक नही ,याद करना तो दूर की बात है, और आज का युवा वर्ग तो इन सभी तथ्यों से कोई मतलब ही नहीं रखना चाहता, इन तथ्यों से उन्हें तो बोरिंग महसूस होने लगता है।

 

 

 हमे अपनी स्वंत्रता पर गर्व है, लेकिन हमे अभी बहुत आगे जाना है। हमे उन तमाम संकल्पो को साकार करना है जो हमने स्वंत्रता संग्राम के दौरान लिए थे, लेकिन यह तब होगा जब हम स्वयं ‘स्वतंत्र ‘ होंगे अर्थात अपने लिए अपना एक तंत्र बनाएंगे। ऐसा तंत्र जिसमे हम अपने, अपने समाज, देश और मानवता के लिए ऐसे आचरण का चयन करेंगे जो चारो ओर खुशियाँ और उन्नत का बीज बोये, स्वंत्रता के इस 69 वर्ष बाद भी हमे अपनी गलतियों और कमजोरियों का एहसास होना चाहिए और उन्हें दूर करने के रहस्यों को समझने एवं सोचने की कोशिश करनी चाहिए। हम विदेशी अक्रान्ताओ से तो जरूर स्वतंत्र हुए पर क्या अपने और अपनी कमजोरियों से स्वत्रंत हो पाये हैं ? यह एक बड़ा सवाल है।

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